पूंजीवादी षोशण नीति और लोकतंत्रीय समाज व्यवस्था

 

Dr.Nister Kujur

Asst. Professor, SoS.in Sociology, Pt. Ravishankar  Shukla University, Raipur (C.G) India

*Corresponding Author E-mail: nister.kujur@yahoo.com

 

पूंजीवादी नीति पूरी तरह धन का असमान वितरण एवं धन का व्यक्तिवादी संचयीकरण के बुनियाद पर खडा है अर्थात धन अर्जित करने के स्वतंत्रता बाजार, लाभ तथा वर्ग विभाजन । वह पूंजी के वृृद्वि के लिए न केवल वचनबद्व है वरन्् इसके लिए शोषण के किसी भी हद को पार करने के उतारू रही है। चाहे वह मजदूरों की छटनी हो या कार्य के घंटें में वृृद्वि अथवा अतिरिक्त मूल्य के रूप में धन का संग्रहण  करना हो ? पंूजीवाद की इस नीति ने पूरे विश्व में औद्योगीकरण और नगरीकरण को बल दिया जिससे विश्वभर में औद्योगीकारण का बेतहासा वृद्वि हुआ, कृषि भूमि, घरेलू उुद्योग जैसे जीविका के परम्परागत किन्तु टिकाउ साधन समाप्त होता चला गया और वैष्विक समुदाय के आत्मनिर्भता धीरे-धीरे समाप्त हो गया और आत्मनिर्भर समाज जीविका के लिए उद्योगों पर आश्रित हो गया तथा  इस नीति से पूंजीपति और धनाडय बनता गया और श्रमिक व कमजोर वर्ग और भी निर्धन व कमजोर होत चला गया। इस प्रकार पूरा समाज दो बडे वर्ग में विभाजित हो गया एक पूंजीपति और दूसरा श्रमिक व सर्वहारा। पूंजीपति अपने पंजी के दम पर अलीषान जीवन यापन  करता वहीं दूसरा  वर्ग प्रथम वर्ग के षोशक के षिकार से मानसिक और षारीरिक दोनों ही दृष्टि से कमजोर होता चला गया । षोशण के विरूद्व आन्दोलन  करता चंूकि इसमें भी छटनी और मजदूरी से बेदखल होने के भय से  हमेषा चिन्तित रहता है। पूंजीवादी षोशण की इन  नीति के विरूद्व माक्र्स ने अवश्य श्रमिको का पूरजोर सहयोग किय है और अपने भविष्यवाणी में श्रमिकों व सर्वहारा वर्ग के लिए एक महान आषा प्रकट की है कि एक समय आयेगा जिसमें सर्वहारा और पूंजीपतियों बीच संघर्ष के फलस्वरूव उनके पंूजी की षक्ति को तोडकर ध्वस्त करेगी और समाजवादी समाज व्यवस्था की स्थापना करेगा।

 

माक्र्स को पंूजीपतियों के इस षोशण की नीति ने सर्वहारा का नेता व मसीहा बना दिया है। श्रमिकांे की यह दुदर्षा न केवल राजषाही षासन व्यवास्था में रहा बल्कि विष्व के संपूर्ण समाज व्यवस्थ में अपनी विस्तार कर लिया तथा यह षोशण औद्योगिक क्रांति लेकर वर्तमाान में भी उतना ही सषक्त और मजबूत बना हुआ है । लोकतंत्रीय समाज व्यवस्था भी इस नीति से अपने आप को पृृथक नहीं रख सका जो और भी सर्मनाक कहा जा सकता है । लोकतंत्रीय समाज व्यवस्था में सर्मनाक इसलिए की इस व्यवस्था नागरिक को  मौलिक अधिकार में कई अधिकार प्रदान करता है।

 

लोकतंत्र के तमाम सुरक्षात्मक प्रयास के उपरांत भी गुलामी में बडी संख्या में लोग पूंजीवादी शोषण का शिकार हो रहे है। दैनिक अखबार हरिभूमि रायपुर 2013 में प्रकाशित समाचार में छत्तीसगढ से लौट रहे ओडिशा के मजदूरों के काट दिए गए हाथ ! इस घटना में पूंजीपति ठेकेदार के गिरफ्त में आये ओडिशा के दर्जभर मजदूर जब पैसा मांगने लगे तो विवाद खडा कर दी तथा तलवार निकालकर दो मजदूरों के हाथ काट दिये। अखबार से पुष्टि होती है कि इस घटना का  संबंध  मानव तस्करी अर्थात मजदूरो के तस्करी से जुडा है, यह घटना बंधुआ लोगों के वास्तविक शोषण नीति की पुष्टि करता है।

 

प्रस्तुत शोध पत्र में लोकतंत्रीय समाज व्यवस्था में पंूजीवादी शोषण नीति से कहां तक नागरिक शोसित है तथा संवैधानिक व्यवस्थ कहां तक अपने नागरिकों सुरक्षा प्रदान करने सफल है ज्ञात करने का प्रयास किया गया है । शोध पत्र दिनांक 18-19 अक्टूबर 2013 को कल्याण पी.जी. महाविद्यालय, भिलाई नगर, दुर्ग में आयोजित राश्ट्््रीय शोध संगोश्ठी में प्रस्तुत किया जा चुका है तथा संगोष्ठी में प्राप्त सुझाओं को सुधार कर प्रकाशन  हेतु तैयार किया गया है।

 

षोध अध्ययन का उद्वेष्य-

प्रस्तुत शोध अध्ययन के निम्न उद्वेश्य है-

1.    पूंजीवादी व्यवस्था पूंजीपतियों के हितो पर आधारित है जिसका उद्वेष्य धन अर्जित करना है।

2.    लोकतंत्रीय समाज व्यवस्था पंूजीवाद के षोशण नीति से नागरिकों को  कहां तक सुरक्षा प्रदान करने में सहायक है ज्ञात करना।

 

अध्ययन पद्वति:

प्रस्तुत शोध-पत्र द्वितीयक तथ्यों पर आधारित है जिसमें द्वितीय आकणों का         प्रयोग किया गया है जियमें इन्टरनेट, अखबार, टेलीविजन न्यूज, पत्रिकाओं इत्यादि के द्वारा तथ्यों का संकलन  किया गया है और प्राप्त तथ्यों का  विश्लेषण किया    गया है।

 

नागरिको को प्राप्त मौलिक अधिकार:

भारतीय संविधान में कुल 22 भाग है जिसमें 6 वें भाग में भारतीय नागरिकों को 6 मौलिक अधिकार प्रदान की गई है जो निम्न है - 1. समता का अधिकार, 2. स्वतंत्रता का अधिकार,  3. षोशण के विरूद्व अधिकार, 4. धर्म की स्वतंत्रता, 5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार, 6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार प्रमुख है, इसके अतिरिक्त मानव अधिकार में भी एक व्यक्ति को सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है।

 

संविधान के प्रस्तावना में संविधान का उद्वेष्य- भारत के समस्त नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, प्रतिश्ठा, और अवसर की समानता, तथा व्यक्ति की गरिमा को सुनिष्चित करने का संकल्प लिया गया है।

 

विष्व के प्रमुख देषों में बंधुआ लोगों का विवरण -

पूंजीवादी षोशण नीति की समस्या से विष्व के अधिकांष देष जुझ रहा है। पूरे विष्व में 2 करोड, 98 लाख लोग दासता के बंधन में जींदगी जी के लिए मजबूर है यहां कुछ प्रमुख देशों में बंधुआ मजदूरों विवरण निम्नानुसार है -

 

उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है कि विश्व में बधुआ अथवा दासत्व लोगों की सर्वाधिक आबादी भारत की है जहां विश्व के बंधुआ जीवन काट रहे लोगो का 43.3 प्रतिशत लोग भारत में कैद है, दूसरा स्थान चीन और तीसरा स्थान पाकिस्तान का है जहां क्रमशः 9.7, 7.1 प्रतिशत बंधुवा दास्तव में जी रहे है । गुलामों में मामले मे गुलाम सबसे अच्छी स्थिति आइसलैंड की जहां 100 से भी कम गुलाम पाये जाते है इसके बाद आयरलैण्ड, ब्रिटेन, न्यूजीलैण्डस्विटजरलैण्ड, स्वीडन, नार्वे और लग्जमबर्ग का क्रम है।

 

उपरोक्त तथ्य इस बात को दर्षाते है कि लोकतंत्रीय व्यवस्था के सारे प्रावधान और यहां तक की मौलिक अधिकार एवं मानवअधिकार इन बंधुआ दास्ता में रहने वाले लोगों के लिए निर्थक हो रहे है ।

 

छत्तीसगढ में पलायन एवं बंधुआ मजदूर:

छत्तीसगढ राज्य मजदूरों के पलायन की समस्या से अछूता नहीं रहा है, यहां बडे पैमाने पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन किया गया तथा राज्य को तेजी से विकास कर रहे राज्य के रूप में राष्ट््रीय स्तर पर पहचान बना चुकी है। किन्तु दूसरी ओर यहां ग्रामीण छत्तीसगढ के बडी अबादी बेरोजगारी की समस्या से जुझ रहा है, इस अबादी में अधिकांश कृषि एवं कृषि मजदूर है जिसे कृषि कार्य से महज 5 माह रोजगार किल पाती तथा मनरेगा योजना से 2-3 माह और 4 माह वह बेरोजगार हो जाता है। यह अबादी अपनी परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दिसम्बर-फरवरी माह में रोजगरी की तलाष में सीमावर्ती राज्यों में बडी संख्या में पलायन करता है। । पलाय स्थान में पंूजीवादी षोशण का सामना करते है इनमें कई बंधुआ और दासत्व में फस जाते है पूंजीपति और ठेकेदारों के षोशण के षिकार होते है। छत्तीसगढ राज्य में 2000-2011 तक पलायन के आंकडे नीचे तालिका में दर्षाया गया है।

 

उपरोक्त तालिका से ज्ञात होता है 11 वर्शो में 12,32,451 लोगों ने   रोजगार की तलाष में पलायन दूसरे राज्यों में पलायन किया है। इसका तात्पर्य यहा है कि प्रति वर्श एक लाख से अधिक लोग मजदूरी अथवा कार्य की तलाष में दूसरे राज्यों में पलायन करते है यह तथ्य इस बात को स्पश्ट करता है कि सरकार द्वारा रोजगार उपलब्ध कराने की दिषा में जितने भी योजनाए संचालित की है वह लोगों को उनकी आवष्यकता के अनुसार रोजगार प्रदाान करने के विफल है। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य  यह है कि पलायन उन राज्यों में हो रहे है जहां आर्थिक रूप से पलायन राज्य से भी अधिक बीमार ग्रस्त है जैसे बिहार, उत्तरप्रदेष, झारखण्ड, ओडिषा, राजस्थान आदि इसका तात्पर्य यह है कि मजदूर निजी क्षेत्र जैसे इंटा भठा, भवन निर्माण जैसे कार्यो को करने में संलग्न है और इन क्षेत्रों में बंधुआ होने की संभावना अधिक होती है।

 

तालिका से ज्ञात होता है कि कुल पलायन लोगों में 1284 लोग बधुंआ अथवा पूंजीपतियों के दासत्व में कैद रहे है। यह आंकडे तो उनकी है जिन्होंने  बंधक होने की सूचना सरकार को पहुंचाया जिन्हें सरकार पंूजीपतियों के दासत्व या कैद से छुडाया है । किन्तु ऐसे बंधुआ और कितने है जिनकी सूचना सरकार या पुलिस तक पहुंची ही नहीं ? ऐसे बंधुआ मजदूरों के संबंध माक्र्स कहते है -मजदूर दासत्व में जन्म लेता है दासत्व में ही मर जाता है। मजदूरों की यह परिस्थितियां माक्र्स काल में भी थी और वर्तमान लोकतंत्रीय  समाज व्यवस्था में भी पाया जाता है। बंधुआ मजदूरांे को कई समस्याओं का सामना करते है जैसे-

1. कार्य स्थल का प्रदूशित होना,

2. पारिश्रमिक को कई माह तक रोके रखना,

3. कार्य का कोई समय-सीमा नहीं होना,

4. बंधक बनाकर रखना,

5. महिलाओं एवं बच्चों का शोषण करना,

7. तस्करी एवं बेचे जाने की खतरा।

 

निश्कर्श एवं सुझाव:

उपरोक्त तथ्यों के विष्लेशण के आधार पर निश्कर्शः कहा जा सकता है कि यह वैष्विक स्तर की समस्या है । संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत लोगों के समाजाजिक-आर्थिक समस्याओं को दूर करने तथा विकास के स्तर को प्राप्त करने के लिए प्रथम पंचवर्शीय योजना अन्तर्गत कई योजनाओं का क्रियान्वयन कर रही है। तमाम प्रयत्नों के उपरांत भी हम स्वास्थ्य, षिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्थिति, आवास, पेयजल, बिजली, आवागमन के साधन जैसे बुनियादी आवष्यकताओं को पूरा करने में स्वतंत्रता के 66 वर्श बाद भी विफल है। दूसरी ओर नगरीकरण, औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप लोगों में स्वयं के विकास के प्रति जागरूकता आई है तथा व्यक्तिगत जीवन स्तर को सुधारने के उद्वेश्य से देश के बेरोजगार मजदूर रोजगार की तलाश में पलायन करते है। पलायन करन एक तरह के आजीविका के लिए जागरूक को प्रदर्शिक करता है। इनकी सुरक्षा संवैधानिक व्यवस्था अन्तर्गत लागू की गई कानूनों से सरकार को करना चाहिए, किन्तु भारत में विश्व की सर्वाधिक 1.29 करोड. मजदूरों का बंधुआ अथवा दासत्व में होना व्यक्ति  को प्रदान की गई मौलिक अधिकार और मानव अधिकार पर प्रश्न खडा करता है और ऐसा प्रदर्शित करता है कि पूंजीवादी शक्तियां लोकतांत्रिक कानून-व्यवस्था एक तरह खुलम-खुला अवहेलना कर रहा है तथा अपने हीत को पूरा कर रहा है। इसी तरह छत्तीसगढ राज्य में भी  वर्ष 2001 से 2011 तक कुल 12,32,451 मजदूर पलायन किये जिसमें से 1284 मजदूर विभिन्न राज्यों में बंधक बनाये गया ।

 

मजदूरों के बंधक या दासत्व होने के पीछे दो प्रमुख कारण है जिसमें पहला तो यह है कि पलायन करने वाले लोगों में शिक्षा का निम्न स्तर होना है जिससे इनमें कानून एवं अधकार से लगभग अनभिज्ञ होते है । दूसरा राजनीति  एवं नौकरशाही व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा भ्रष्टाचार के कारण वास्तविक कार्यवाही नहीं करता है। पंूजीपति अपने पंूजी एवं लाभ के लिए लोकतंत्र के नाक के नीचे  सारे नियमों का उल्लघन करता है क्योंकि वह जानता है की समाज के दो प्रमुख वर्ग को अपने अधिन पंूजी करता रहा है और मनमाफिक मजदूरों को बंदी बनाकर इनका शोषण करता   है ।

प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर इसका समाधान तभी संभव है जब कानून के रक्षक नौकरशाह एवं राजनीतिज्ञ सबसे पहले जनता के उत्तरदायी के गभीरता को सकझे तथा मजदूरों को इससे संबंधिक पूरे कानून का ज्ञान हो, परिस्थिति निर्मित होने पर कानून का सहारा ले इसके लिए इनमें जागरूकता आवश्यक है । पूंजीपतियो के लिए इतना कठोर कानून हो कि वह बंधक बनाने और शोषण जैसे गैर कानूनी कार्य करने से बचने का प्रयास करे। 

 

REFERENCE:

1.       Marx and Engels, The Communist Manifesto, introduction by Martin Malia (New York: Penguin group, 1998, pg. 35

2.       Durkheim, E., The Rules of Sociological Method. Chicago: The University of Chicago Press. 1938,  p. 67.

3.       Micheline R. Ishay. The History of Human Rights: From Ancient Times to the Globalization Era. Berkeley and Lose Angeles, California, USA: University of California Press, 2008. P. 148.

4.       Marx, Karl and F., Engels,  The Communist Manifesto,  1848. 

5.       nSfud lekpkj i=] gfjHkwfe] 17 fnlcj] 2013] i``-1-

6.       Bonded Labour, Govt. of Chhattisgarh Daapart. Of  labour,2011.

7.       Marx ,Karl, Engels.F;   The Summary Suppression of the Neue Rheinische Zeitung Marx-Engels Collected Works. Volume 9. New York: Inter. Publishers ,1977.  pp. 451–453.  

 

 

 

Received on 04.10.2013       Modified on 12.11.2013

Accepted on 28.11.2013      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 48-50